Friday, 16 September 2016

कुरान के वैज्ञानिक चमत्कार

कुरान के वैज्ञानिक चमत्कार

६ दिनों (६अवधियों) में सृष्टी का निर्माण
पार्ट-३
कुरान में सूरह अल बकरह पाठ संख्या २५ आयत संख्या २५५ में लिखित है कि

(255) अल्लाह उसके अतिरिक्त कोई उपास्य नहीं। वह जीवित है, संपूर्ण जगत का संभालने वाला है, उसको न ऊँघ आती है न निद्रा। उसी का है जो कुछ आकाशों में और पृथ्वी मं है। कौन है जो उसके पास उसकी अनुमति के बिना सिफारिश कर सके। वह जानता है जो कुछ उनके आगे है और जो कुछ उनके पीछे है। और वह अल्लाह के ज्ञान में से किसी चीज़ को घेरे (परिधि) में नहीं ले सकते, परन्तु जो वह चाहे। उसकी सत्ता आकाशों और पृथ्वी पर छायी हुई है। वह थकता नहीं उनके थामने से। और वही है उच्च प्रतिष्ठा का मालिक, महान।
दूसरी तरफ , यदि हम समय की कल्पना करें तो तो ६ दिन का समय एक भिन्न अन्तराल बनता है,जिसका कारण है है कि समय के गुजरने की गति बह्मांड के फैलने के अनुपात से कम होती जाती है,,बिंग बैंग के आरंभ से अब तक बह्मांड का आकार दो गुना हो चुका है,और समय के गुजरने की गति उससे आधी हो चुकी है,जैसे जैसे बह्मांड का आकार बढ़ता गया,जिस गति से आकार दोगुना हुआ समय की गति कम हुई,  बह्मांड के आकार के बढ़ने का यह सिद्धांत एक वैज्ञानिक तथ्य है जो अब शैक्षिक पुस्तकों में है,यह साहित्य अब 'फिज़िकल कौसमोलोजी' का आधार हैं, जब हब सृष्टी की रचना का हर दिन की पृथ्वी के समयनुसार गणना करते हैं, कुछ इस प्रकार की स्थिति होती है
जिस समय 'समय' आरंभ हुआ उस स्थिति की कल्पना करें, सृष्टी की रचना की पहल दिन ( पहला युग,अवधि,अंतराल) जो २४ घंटे घटित हुआ,हालांकि यह समय बराबर होगा ८ बिलियन वर्षों के पृथ्वी के समय की तुलना में,
सृष्टी की रचना का दूसरा दिन (दूसरा युग,अवधि,अंतराल) जो २४ घंटे घटित हुआ,लेकिन यह समय पहले की तुलना में आधा समय रहा, हालांकि यह समय बराबर होगा ४ बिलियन वर्षों के पृथ्वी के समय की तुलना में,
सृष्टी की रचना का तीसरा दिन( तीसरा युग,अवधि,अंतराल) यह युग दूसरे की तुलना में आधा रहा, अर्थात २ बिलियन वर्ष,
सृष्टी की रचना का चौथा दिन (चौथा युग,अवधि,अंतराल) एक बिलियन वर्ष तक रहा,
सृष्टी की रचना का पांचवां दिन (पांचवां युग,अवधि,अंतराल) ५०० मिलियन वर्ष तक रहा,
और
सृष्टी की रचना का छठा दिन ( (छठा युग,अवधि,अंतराल) २५० मिलियन वर्ष तक रहा,
निष्कर्ष:
जब इन ६ दिन ( ६ युग,अवधि,अंतराल)  के समय को पृथ्वी के समय के परिपेक्ष में आपस में जोडा जाता है तो कुल योग आता है, १५ बिलियन ७५० मिलियन वर्ष ,
और यह गणना आधुनिक समय की गणनाओं के समीप है,
और यह निष्कर्ष २१वीं सदी के विज्ञान द्वारा किया गया है,और विज्ञान एक बार फिर उस तथ्य को सत्यापित करता है जो १४०० वर्ष पूर्व कुरान में लिखित है,और कुरान और विज्ञान में यह समानता एक और चमत्कारिक प्रमाण है कि कुरान ईश्वर की पुस्तक है,

Thursday, 15 September 2016

सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों पर वेद और वैदिक आर्य?

सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों पर वेद और वैदिक आर्य?

इसकी पुष्टि एक दूसरे प्रमाण से भी होती है, जहाँ दयानन्द जी ने यह कल्पना कर डाली है कि सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रादि सब पर मनुष्‍यादि गुज़र बसर कर रहे हैं और वहाँ भी इन्हीं चारों वेदों का पाठ किया जा रहा है। उन्होंने अपनी कल्पना की पुष्टि में ऋग्वेद (मं0 10, सू0 190) का प्रमाण भी दिया है-
‘जब पृथिवी के समान सूर्य, चन्द्र और नक्षत्र वसु हैं पश्चात उनमें इसी प्रकार प्रजा के होने में क्या सन्देह? और जैसे परमेश्वर का यह छोटा सा लोक मनुष्यादि सृष्टि से भरा हुआ है तो क्या ये सब लोक शून्‍य होंगे?’ (सत्यार्थ., अष्टम. पृ. 156)
(22) क्या यह मानना सही है कि ईश्वरोक्त वेद व सब विद्याओं को यथावत जानने वाले ऋषि द्वारा रचित साहित्य के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा और अन्य ग्रहों पर मनुष्‍य आबाद हैं और वे वहां वेदपाठ और हवन कर रहे हैं?
(23) चन्द्रमा पर कई वैज्ञानिक जाकर लौट आए हैं। सेटेलाइट के ज़रिये चन्द्रमा
के हर हिस्से के फ़ोटो ले लिए गए हैं। वहां अभी तक तोप और बन्दूक़ बनाने वाली कोई फ़ैक्ट्री क्यों नहीं मिल पाई?
(24) क्या सूर्य पर वेदपाठी आर्यों के रहने और तोप और बन्दूक़ें रखने की बात कहना पौराणिकों से बड़ी गप्प मारना नहीं कहलाएगा? 
    अतः सत्यार्थप्रकाश और ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आर्य समाजियों के पुराण सिद्ध होते हैं।
पुस्तक युनिकोड में चार पार्ट में इधर भी है
 http://108sawal.blogspot.in/2015/04/swami-dayanand-ne-kiya-khoja-kiya-paya.html

Sunday, 4 September 2016

क्या कोरी बकवास है इसलाम का परलोकवाद !

कुछ लोग इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि एक ऐसा व्यक्ति जिसकी सोच वैज्ञानिक और तार्किक हो वह परलोकवाद को किस तरह स्वीकार कर सकता है। लोग समझते हैं कि परलोकवाद में विश्वास करने वाले अंधविश्वास से ग्रस्त होते हैं। वास्तविकता यह है कि परलोक धारणा एक तर्कसंगत धारणा है।

परलोक की धारणा के तार्किक आधार
पवित्र कुरआन में एक हजार से अधिक ऐसी आयतें हैं जिनमें वैज्ञानिक तथ्यों को बयान किया गया है। (देखिये पुस्तक Quran and Modern Science Compatible Or Incompatible) इन तथ्यों में वे तथ्य भी शामिल हैं जिनका पता पिछली कुछ शताब्दियों में चला है बल्कि वास्तविकता यह है कि विज्ञान अब तक इस स्तर तक नहीं पहुँच सका है कि वह कुरआन की हर बात को सिद्ध कर सके। मान लीजिए कि पवित्र कुरआन में उल्लेखित तथ्यों का 80 प्रतिशत भाग विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरता है तो बाकी 20 प्रतिशत के बारे में भी सही कहने की बात यह होगी कि विज्ञान उनके संबंध में कोई निर्णायक बात कहने में असमर्थ है। क्योंकि वह अभी अपनी उन्नति के उस स्तर तक नहीं पहुँचा है कि वह पवित्र कुरआन के बयानों की पुष्टि या उनका इंकार कर सके। हम अपनी सीमित जानकारियों के आधार पर विश्वास के साथ नहीं कह सकते कि कुरआन के बयानों का एक प्रतिशत अंश भी गलत और गलती पर आधारित है। देखने की बात यह है कि कुरआन के सम्पूर्ण बयानों का अगर 80 प्रतिशत वास्तविक रूप से सही सिद्ध होता है तो तार्किक तौर पर शेष 20 प्रतिशत के बारे में भी यही निर्णय किया जाएगा। इस्लाम में परलोक या मृत्यु के पश्चात जीवन की कल्पना इसी 20 प्रतिशत हिस्से से संबंधित हैजिसके बारे में बुद्धि और तर्क की माँग है कि उसे सही और त्रुटिहीन स्वीकार किया जाए।
परलोक की धारणा के बिना शान्ति तथा मानवीय मूल्यों की कल्पना व्यर्थ है
डकैती या लूटमार अच्छी चीज़ है या बुरी एक आम सरल स्वभाव व्यक्ति उसे एक बुरी चीज़ समझेगा। एक ऐसा व्यक्ति जो परलोक पर विश्वास नहीं रखता किसी बड़े अपराधी को किस तरह संतुष्ट कर सकता है कि डकैती या लूटमार का काम एक बुरी चीज़ है। मान लीजिए कि मैं दुनिया का एक बहुत बड़ा अपराधी हूँ और साथ ही मैं एक अत्यंत बुद्धिमान और तर्क के आधार पर कोई बात मानने वाला व्यक्ति भी हूँ। मैं कहता हूँ कि लूटमार करना सही है क्योंकि इससे मुझे ऐश व आराम से भरपूर जि़न्दगी गुजारने में मदद मिलती है, इसलिए लूटमार मेरे लिए सही है। अब अगर कोई व्यक्ति उसके बुरे होने का कोई एक तर्क भी पेश कर सके तो में उससे तुरंत रुक जाऊँगा। लोग आमतौर से निम्रलिखित तर्क पेश कर सकते है: ((क) जिस व्यक्ति को लूटा जाता है वह कठिनाई में पड़ जाता है कोई कह सकता है कि जिस आदमी को लूटा जाता है वह बड़ी मुसीबतों का शिकार हो जाता है। मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि जिसे लूटा जाता है उसके लिए यह बुरा है। लेकिन मेरे लिए यह अच्छा है। अगर मैं एक लाख रुपए लूटमार करके हासिल कर लूँ तो मैं किसी भी पाँच सितारा होटल में स्वादिष्ट खानों से आनन्दित हो सकता हूँ। (ख) कुछ लोग आपको भी लूट सकते हैं कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि आपके साथ भी ऐसा हो सकता है कि आप लूट लिए जाएँ। लेकिन इसके जवाब में मैं कह सकता हूँ कि मेरे साथ ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि मैं एक अत्यनत शक्तिशाली अपराधी हूँ और अपने साथ सैकड़ों बॉडीगार्ड रखता हूँ। इसलिए मैं तो किसी को भी लूट सकता हूँ लेकिन कोई दूसरा मुझे नहीं लूट सकता लूटमार करना एक आम आदमी के लिए तो खतरनाक हो सकता है लेकिन एक प्रभावशाली व्यक्ति के लिए नहीं। (ग) पुलिस आपको गिरफ्तार कर सकती है कुछ लोग कह सकते हैं कि अगर आप लूटमार करते हैं तो पुलिस आपको गिर$फ्तार कर सकती है। इसका जवाब मैं यह दे सकता हूँ कि पुलिस मुझे इसलिए गिरफ्तार नहीं कर सकती कि पुलिस मेरे प्रभाव में है। इसी तरह कई मंत्री भी मेरे प्रभाव में हैं। मैं यह बात मानता हूँ कि अगर एक आम आदमी डकैती या लूटमार करता है तो वह गिर$फ्तार हो सकता है और यह बात उसके लिए बुरी हो सकती है लेकिन किसी असाधारण शक्ति और पहुँच रखने वाले अपराधी का पुलिस कुछ नहीं बिगाड़ सकती। (घ) लूटमार की कमाई बेमेहनत की कमाई है कुछ लोग कह सकते हैं कि यह आसानी के साथ प्राप्त की हुई कमाई है। मेहनत की कमाई नहीं है। मैं इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ कि यह आसानी की कमाई है। यही कारण है कि मैं लूटमार करता हूँ। अगर एक बुद्धिमान व्यक्ति के सामने दो विकल्प हों यानी वह आसानी के साथ भी दौलत कमा सकता है और परिश्रम के साथ भी तो नि:संदेह वह आसानी को पसन्द करेगा। (ङ) लूटमार करना मानवता के विरूद्ध है कुछ लोग कह सकते हैं कि लूटमार करना मानवता के विरूद्ध है और एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के हितों क ख़्ायाल रखना चाहिए। मैं इस तर्क का यह कहकर जवाब दे सकता हूँ कि आिखर मानवता नाम का यह नियम किसने बनाया है और मैं क्यों इसका पालन करूँ? यह नियम भावुक लोगों के लिए तो अच्छा हो सकता है लेकिन चूँकि मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जो तर्क में विश्वास करता हूं, मुझे दूसरों के हितों का खयाल रखने में कोई लाभ नजर नहीं आता। (च) लूटमार करना एक स्वार्थपूर्ण कार्य है कुछ लोग कह सकते हैं कि यह एक स्वार्थपूर्ण कार्य है। यह बात सत्य है कि लूटमार करना एक स्वार्थपूर्ण कार्य है, लेकिन मैं स्वार्थी क्यों न बनूँ?इससे मुझे आनन्दपूर्ण जीवन गुज़ारने में मदद मिलती है।
(१) लूटमार के बुरा होने का कोई तार्किक कारण नहीं है वे सभी तर्क जो इस बात को साबित करने के लिए दिए जा सकते हैं कि लूटमार एक बुरा काम है, इस प्रकार उपरोक्त स्पष्टीकरण की रोशनी में व्यर्थ सिद्ध होते हैं। यह प्रमाण और तर्क आम लोगों को तो संतुष्ट कर सकते हैं लेकिन किसी शाक्तिशाली और प्रभावशाली अपराधी को नहीं। इनमें से किसी भी प्रमाण को तार्किक आधारों पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसमें आश्चर्य की भी कोई बात नहीं है कि इस दुनिया में अपराधी लोग भरे पड़े हैं। इसी प्रकार धोखा-धड़ी और बलात्कार आदि अन्य बुराइयों का मामला है। किसी भी प्रभावशाली और शक्तिशाली अपराधी को किसी भी तार्किक प्रमाण के साथ इन चीज़ों के बुरा होने के बारे में संतुष्ट नहीं किया जा सकता।
(२) एक मुस्लिम किसी प्रभावशाली और शक्तिशाली अपराधी को संतुष्ट कर सकता है अब हम समस्या पर एक-दूसरे रुख से वार्ता करते हैं। मान लीजिए कि आप दुनिया के एक अत्यन्त प्रभावशाली और शक्तिशाली अपराधी हैं। आपके प्रभाव में पुलिस व मंत्री हैं तथा आपके पास आपकी सुरक्षा के लिए फौज ही फौज है। आपको एक मुस्लिम कायल कर सकता है कि लूटमार करना, धोखा-धड़ी करना, बलात्कार और कुकर्म करना ये सारी चीज़ें गलत और बुरे कर्म हैं। (३) प्रत्येक व्यक्ति न्याय चाहता है प्रत्येक व्यक्ति न्याय चाहता है। अगर वह दूसरों के लिए न्याय का इच्छुक न भी हो फिर भी वह अपने लिए तो अवश्य ही न्याय की अभिलाषा करता है। कुछ लोग ताकत और प्रभाव के नशे में चूर होते हैं और दूसरों को दुख और तकलीफ पहुंचाते हैं। अगर इन लोगों के साथ कोई अन्याय होता है तो उन्हें इस पर शिकायत होती है। ऐसे लोग जो दूसरों के दुख-दर्द को महसूस नहीं करते वास्तव में ताकत और प्रभाव के पुजारी होते हंै। यह ताकत और प्रभाव न केवल उन्हें दूसरों पर अत्याचार करने पर उभारता है बल्कि दूसरों को उन पर अत्याचार करने से रोकने में भी सहायक होता है।
खुदा सबसे ज्य़ादा शक्तिशाली और न्यायी है
एक मुस्लिम की हैसियत से एक व्यक्ति किसी अपराधी को $खुदा के अस्तित्व के बारे में कायल कर सकता है। यह खुदा किसी भी अपराधी से ज्य़ादा शक्तिशाली है और हरेक के साथ न्याय करने वाला भी। पवित्र कुरआन में है- ''खुदा कभी कण-भर भी अन्याय नहीं करता।ÓÓ (कुरआन, 4:40)
खुदा सज़ा क्यों नहीं देता? एक ऐसा अपराधी व्यक्ति जो बुद्धि और विज्ञान में विश्वास रखता है वह कुरआन के वैज्ञानिक तथ्यों को देखने के बाद इस बात से सहमत है कि खुदा मौजूद है। वह यह तर्क दे सकता है कि खुदा शक्तिशाली और न्यायी होने के बावजूद उसे अपराधों पर सज़ा क्यों नहीं देता।
जो लोग किसी के साथ अन्याय करते है उन्हें सज़ा दी जाएगी
हर वह व्यक्ति जिसके साथ अन्याय हुआ हो यह देखे बगैर कि उसकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति क्या है, चाहता है कि अत्याचारी को सजा दी जाए। एक आम और सामान्य व्यक्ति चाहता है कि डकैत या बलात्कारी को शिक्षाप्रद सज़ा दी जाए। हालाँकि बहुत-से अपराधियों को सजा हो जाती है फिर भी बहुत-से अपराधी कानून की पकड़ से बच निकलने में सफल हो जाते हैं। वे भोग-विलास से पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं और आराम और चैन से रहते हैं। अगर ऐसे लोगों के साथ कोई ऐसा व्यक्ति अत्याचार करता है जो उनसे ज्य़ादा शक्तिशाली और प्रभावशाली होता हैं तो ये लोग इस बात के अभिलाषी होते हैं कि इस अत्याचारी को सज़ा दी जाए।
यह जीवन परलोक के लिए आज़माइश है
यह दुनिया परलोक के लिए परीक्षा स्थल है। पवित्र कुरआन में है- ''जिसने मौत और जिन्दगी को पैदा किया ताकि तुम लोगों को आजमाकर देखे कि तुममेे से कौन अच्छे से अच्छा कर्म करने वाला है और वह प्रभुत्वशाली भी है और क्षमा करने वाला भी।ÓÓ (कुरआन, 67:2)
फैसले के दिन पूर्ण न्याय किया जाएगा
पवित्र कुरआन में है- ''हर जान को मौत का मज़ा चखना है और तुम सब अपनी पूरी-पूरी मज़दूरी प्रलय के दिन पाने वाले हो, सफल वास्तव में वह है जो वहाँ नरक की आग से बच जाए और स्वर्ग में दािखल कर दिया जाए। रहा यह संसार तो यह केवल एक जाहिरी धोखे की चीज़ है।ÓÓ (कुरआन, 3:185) इंसान के साथ आिखरी और पूर्ण न्याय का मामला बदले के दिन होगा। सारे इंसानों को परलोक में हिसाब के दिन उठाया और जि़न्दा किया जाएगा। यह संभव है कि किसी व्यक्ति की उसके किए कि सज़ा का एक भाग इस दुनिया में ही मिल जाए, लेकिन फाइनल सज़ा या इनाम उसे आिखरत में दिया जाएगा। महान खुदा एक डकैत या बलात्कारी को चाहे इस दुनिया में सज़ा न दे लेकिन परलोक में फैसले के दिन वह ज़रूर अपराधी को सज़ा देगा।
इंसानी कानून हिटलर को भला क्या सज़ा दे सकता है?
हिटलर ने लगभग 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतारा। पुलिस अगर उसे गिरफ्तार कर लेती तो इंसानी कानून उसे क्या सज़ा दे पाता? ज्य़ादा से ज्यादा जो सज़ा ऐसे व्यक्ति को मिल सकती है वह यह है कि उसे भी गैस चेम्बर में भेज दिया जाए। लेकिन देखा जाए तो यह सिर्फ एक यहूदी को किसी प्रकार गैस चैम्बर में जला देने की सज़ा होगी, लेकिन बाकी 59 लाख 99 हजार 99९ जलाकर मारे गए लोगों के बारे में आप क्या कहेंगे?
खुदा हिटलर को 60 लाख से ज्य़ादा बार नरक में जला सकता है
पवित्र कुरआन में है- ''जिन लोगों ने हमारी आयतों का इंकार किया उन्हें हम जल्द ही आग में झोकेंगे। जब भी उनकी खालें पक जाएँगी तो हम उन्हें दूसरी खालों से बदल दिया करेंगे। ताकि वे यातना का मज़ा चखते ही रहें। निस्संदेह खुदा प्रभुत्वशाली तत्वदर्शी है।ÓÓ (कुरआन, 4:56) अगर खुदा चाहे तो वह हिटलर को 60 लाख से ज्य़ादा बार नरक में जला सकता है।
परलोक की धारणा के बिना मानवीय मूल्यों और भलाई-बुराई की कोई कल्पना नहीं
यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि परलोक की धारणा के बगैर आप किसी अत्याचारी के सामने भलाई-बुराई और मानवीय मूल्यों की वास्तविकता को सिद्ध नहीं कर सकते। विशेष रूप से ऐसे व्यक्ति के सामने जो अत्याचारी, दमनकारी और शक्तिशाली हो

रोज़ाः और मानव जीवन पर उसका प्रभाव

रोज़ाः और मानव जीवन पर उसका प्रभाव

विज्ञान के इस आधुनिक युग में इस्लामी उपवास के विभिन्न आध्यात्मिक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक लाभ सिद्ध किए गए हैं। जिन्हें संक्षिप्त में बयान किया जा रहा है।

आध्यात्मिक लाभः

(1) इस्लाम में रोजा का मूल उद्देश्य ईश्वरीय आज्ञापालन और ईश-भय है, इसके द्वारा एक व्यक्ति को इस योग्य बनाया जाता है कि उसका समस्त जीवन अल्लाह की इच्छानुसार व्यतीत हो। एक व्यक्ति सख्त भूक और प्यास की स्थिति में होता है, खाने पीने की प्रत्येक वस्तुयें उसके समक्ष होती हैं, एकांत में कुछ खा पी लेना अत्यंत सम्भव होता है, पर वह नहीं खाता पीता। क्यों ? इस लिए कि उसे अल्लाह की निगरानी पर दृढ़ विश्वास है। वह जानता है कि लोग तो नहीं देख रहे हैं पर अल्लाह तो देख रहा है। इस प्रकार एक महीने में वह यह शिक्षा ग्रहण करता है कि सदैव ईश्वरीय आदेश का पालन करेगा और कदापि उसकी अवज्ञा न करेगा।

(2) रोज़ा ईश्वरीय उपकारों को याद दिलाता औऱ अल्लाह कि कृतज्ञता सिखाता है क्योंकि एक व्यक्ति जब निर्धारित समय तक खान-पान तथा पत्नी के साथ सम्बन्ध से रोक दिया जाता है जो उसकी सब से बड़ी इच्छा होती है फिर वही कुछ समय बाद मिलता है तो उसे पा कर वह अल्लाह ती प्रशंसा बजा लाता है।

(3) रोज़ा से कामवासना में भी कमी आती है। क्योंकि जब पेट भर जाता है तो कामवासना जाग उठता है परन्तु जब पेट खाली रहता है तो कामवासना कमज़ोर पड़ जाता है। इसका स्पष्टिकरण मुहम्मद सल्ल0 के उस प्रबोधन से होता है जिसमें आया है कि "हे नव-युवकों के समूह ! तुम में से जो कोई विवाह करने की शक्ति रखता हो उसे विवाह कर लेना चाहिए क्योंकि इसके द्वारा आँखें नीची रहती हैं और गुप्तांग की सुरक्षा होती है।"

(4) रोज़े से शैतान भी निदित और अपमानित होता है क्योंकि पेट भरने पर ही कामवासना उत्तेजित होता है फिर शैतान को पथभ्रष्ट करने का अवसर मिलता है। इसी लिए मुहम्मद सल्ल0 के एक प्रवचन में आया है "शैतान मनुष्य के शरीर में रक्त की भांति दौड़ता है। भूक (रोज़ा) के द्वारा उसकी दौड़ को तंग कर दो"।
शारीरिक लाभ

(1) मनुष्य के शरीर में मेदा एक ऐसा कोमल अंग है जिसकी सुरक्षा न की जाए तो उस से विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार रोज़ा मेदा के लिए उत्तम औषधि है क्योंकि एक मशीन यदि सदैव चलती रहे और कभी उसे बंद न किया जाए तो स्वभावतः किसी समय वह खराब हो जाएगी। उसी प्रकार मेदे को यदि खान-पान से विश्राम न दिया जाए तो उसका कार्यक्रम बिगड़ जाएगा।

(2) डाक्टरों का मत है कि रोज़ा रखने से आंतें दुरुस्त एंव मेदा साफ और शुद्ध हो जाता है। पेट जब खाली होता है तो उसमें पाए जाने वाले ज़हरीले किटानू स्वंय मर जाते हैं और पेट कीड़े तथा बेकार पदार्थ से शुद्ध हो जाता है।उसी प्रकार रोज़ा वज़न की अधिकता, पेट में चर्बी की ज्यादती, हाज़मे की खराबी(अपच), चीनी का रोग(DIABATES) बलड प्रेशर,गुर्दे का दर्द, जोड़ों का दर्द, बाझपन, हृदय रोग, स्मरण-शक्ति की कमी आदि के लिए अचूक वीण है।

डा0 एयह सेन का कहना हैः "फाक़ा का उत्तम रूप रोज़ा है जो इस्लामी ढ़ंग से मुसलमानों में रखा जाता है।मैं सुझाव दूंगा कि जब खाना छोड़ना हो तो लोग रोज़ा रख लिया करें।"इसी प्रकार एक इसाई चिकित्सक रिचार्ड कहता हैः "जिस व्यक्ति को फाक़ा करने की आवश्यकता हो वह अधिक से अधिक रोज़ा रखे। मैं अपने इसाई भाइयों से कहूंगा कि इस सम्बन्ध में वह मुसलमानों का अनुसरण करें। उनके रोज़ा रखने का नियम अति उत्तम है।" (इस्लाम और मेडिकल साइंस 7) तात्पर्य यह कि उपवास एक महत्वपूर्ण इबादत होने के साथ साथ शारीरिक व्यायाम भी है। सत्य कहा अन्तिम ईश्दूत मुहम्मद सल्ल0 नेः "रोजा रखो निरोग रहोगे"
नैतिक लाभः

रोजा एक व्यक्ति में उत्तम आचरण, अच्छा व्यवहार, तथा स्वच्छ गुण पैदा करता है, कंजूसी,घमंड,क्रोध जैसी बुरी आदतों से मुक्ति दिलाता है। इनसान में धैर्य, सहनशीलता और निःस्वार्थ भाव को जन्म देता है। जब वह भूक की पीड़न का अनुभव करता है तो उसके हृदय में उन लोगों के प्रति दया-भाव उभरने लगता है जो प्रतिदिन अथवा सप्ताह या महीने में इस प्रकार की पीड़नाओं में ग्रस्त होते हैं। इस प्रकार उसमें बिना किसी स्वार्थ और भौतिक लाभ के निर्थनों तथा ज़रूरतमंदों के प्रति सहानुभूति की भावना जन्म लेती है, और उसे पूर्ण रूप में निर्धनों की आवश्यकताओं का अनुभव हो जाता है।

सामाजिक लाभः

रोजा का सामाजिक जीवन पर भी बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है।

(1) वर्ष के विशेष महीने में प्रत्येक मुसलमानों का निर्धारित समय तक रोज़ा रखना, फिर निर्धारित समय तक खाते पीते रहना, चाहे धनवान हों या निर्धन समाज को समानता एवं बंधुत्व के सुत्र में बाँधता है।

(2) धनवान जब भूख एवं प्यास का अनुभव करके निर्धनों की सहायता करते हैं तो उन दोंनों में परस्पर प्रेम एवं मुहब्बत की भावनायें जन्म लेती हैं और समाज शत्रुता, घृणा और स्वार्थ आदि रोगों से पवित्र हो जाता है, क्योंकि सामान्यतः निर्धनों की सहायता न होने के कारण ही चोरी एवं डकैती जैसी घटनाएं होती हैं। सारांश यह कि रोज़ा से समानता, भाईचारा तथा प्रेम का वातावरण बनता है। समुदाय में अनुशासन और एकता पैदा होता है। लोगों में दानशीलता, सहानुभूति और एक दूसरों पर उपकार करने की भावनायें उत्पन्न होती हैं।

मानसिक लाभः

रोजा में एक व्यक्ति को शुद्ध एवं शान्ति-पूर्ण जीवन मिलता है। उसका मस्तिष्क सुस्पष्ट हो जाता है। उसके हृदय में विशालता आ जाती है। फिर शरीर के हल्का होने से बुद्धि विवेक जागृत होती है। स्मरण-शक्ति तेज़ होती है। फलस्वरूप एक व्यक्ति के लिए कठिन से कठिन कामों को भलि-भांति कर लेना अत्यंत सरल होता है।